श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.9.3 
अत्र उपरसाः —
प्राप्तैः स्थायि-विभावानु-भावाद्यैस् तु विरूपताम् ।
शान्तादयो रसा एव द्वादशोपरसा मताः ॥४.९.३॥
 
 
अनुवाद
“जब स्थाई भाव, विभाव और अनुभव विकृत रूप ले लेते हैं, तो शान्त रस से प्रारम्भ होने वाले बारह रसों को उपरस कहते हैं।”
 
“When the sthayi bhaav, vibhaav and anubhaav take a distorted form, then the twelve rasas starting from Shanta rasa are called uprasas.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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