श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  4.8.82 
अधिरूढे महा-भावे विरुद्धैर् विरसाः युतिः ।
न स्याद् इत्य् उज्ज्वले राधा-कृष्णयोर् दर्शितं पुरा ॥४.८.८२॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि अधिरूढ़-महाभाव में सभी प्रतिकूल रस एक साथ मिल जाते हैं, फिर भी कोई अरुचिकरता नहीं होती। यह बात राधा और कृष्ण के मधुर-रस के संबंध में पहले ही दर्शाई जा चुकी है। [3.5.23]"
 
"Although all the adverse rasas are combined together in the adhirudha-mahabhava, there is no unpleasantness. This has already been shown in connection with the madhura-rasa of Radha and Krishna. [3.5.23]"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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