श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  4.8.78 
किं च —
भृत्ययोर् नायकस्येव निसर्ग-द्वेषिणोर् अपि ।
अङ्गयोर् अङ्गिनः पुष्ट्यै भवेद् एकत्र सङ्गतिः ॥४.८.७८॥
 
 
अनुवाद
"हालाँकि, जिस प्रकार एक ही स्वामी, अपने राजा की सेवा के लिए दो स्वाभाविक शत्रुओं का मिलन होता है, उसी प्रकार अंगी-रस के पोषण के लिए दो परस्पर विरोधी अंग-रसों का मिश्रण करने में कोई दोष नहीं है।"
 
"However, just as two natural enemies unite to serve the same master, their king, there is no harm in mixing two mutually opposing body essences to nourish the body essence."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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