श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  4.8.74 
विषयाश्रय-भेदे’पि मुख्येन द्विषता सह ।
सङ्गतिः किल मुख्यस्य वैरस्यायैव जायते ॥४.८.७४॥
 
 
अनुवाद
"भले ही विषय या आश्रय अलग-अलग हों, यदि परस्पर विरोधी रस दोनों ही प्राथमिक रस हैं, तो परिणाम अरुचिकर होगा।"
 
"Even if the subject or the ayashraya are different, if the conflicting rasas are both primary rasas, the result will be unpleasant."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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