श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  4.8.59 
चिरं जीवेति संयुज्य काचिद् आशीर्भिर् अच्युतम् ।
कैलास-स्था विलासेन कामुकी परिषष्वजे ॥४.८.५९॥
अत्र शुचेर् वत्सलेन ।
 
 
अनुवाद
मधुर रस और वत्सल रस: “कैलाश में रहने वाली एक कामातुर स्त्री ने कहा, ‘आप दीर्घायु हों’ और फिर प्रसन्नतापूर्वक कृष्ण को गले लगा लिया।”
 
Madhura Rasa and Vatsala Rasa: “A lustful woman living in Kailash said, ‘May you live long’ and then happily embraced Krishna.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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