श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  4.8.53 
अथ वैरि-कृत्यम् —
जनयत्य् एव वैरस्यं रसानां वैरिणा युतिः ।
सुमृष्ट-पानकादीनां क्षार-तिक्तादिना यथा ॥४.८.५३॥
 
 
अनुवाद
"जिस प्रकार मीठा पेय कड़वे या तीखे स्वाद के साथ मिलकर अरुचिकर हो जाता है, उसी प्रकार रस भी शत्रुतापूर्ण रस के साथ मिलकर अरुचिकर हो जाते हैं।"
 
"Just as a sweet drink becomes unpleasant when mixed with a bitter or pungent taste, similarly juices also become unpleasant when mixed with hostile juices."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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