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श्लोक 4.8.53  |
अथ वैरि-कृत्यम् —
जनयत्य् एव वैरस्यं रसानां वैरिणा युतिः ।
सुमृष्ट-पानकादीनां क्षार-तिक्तादिना यथा ॥४.८.५३॥ |
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| अनुवाद |
| "जिस प्रकार मीठा पेय कड़वे या तीखे स्वाद के साथ मिलकर अरुचिकर हो जाता है, उसी प्रकार रस भी शत्रुतापूर्ण रस के साथ मिलकर अरुचिकर हो जाते हैं।" |
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| "Just as a sweet drink becomes unpleasant when mixed with a bitter or pungent taste, similarly juices also become unpleasant when mixed with hostile juices." |
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