श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.8.5 
प्रेयसस् तु शुचिर् हास्यो युद्ध-वीरः सुहृद्-वराः ।
द्विषो वत्सल-बीभत्स-रौद्रा भीष्मश् च पूर्ववत् ॥४.८.५॥
 
 
अनुवाद
"मधुर, हास्य और युद्ध-वीर-रस साख्य-रस के मित्र हैं। वत्सल-रस, रौद्र-रस और कृष्ण की ओर निर्देशित भयंकर रस सख्य-रस के शत्रु हैं।"
 
"The sweet, comic and war-heroic rasas are friends of the sakhya-rasa. The vatsala-rasa, the raudra-rasa and the bhayanak rasas directed towards Krishna are enemies of the sakhya-rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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