श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  4.8.49 
अङ्गी मुख्यः स्वम् अत्राङ्गैर् भावैस् तैर् अभिवर्धयन् ।
सजातीयैर् विजातीयैः स्वतन्त्रः सन् विराजते ॥४.८.४९॥
 
 
अनुवाद
"रसों के संयोजन में, प्राथमिक रस जो मुख्य अंगी-रस है, सहायक भावों के माध्यम से स्वयं को पोषित करके स्वतंत्र रहता है, जो समान प्रकार के या भिन्न हो सकते हैं, लेकिन शत्रु नहीं होते।"
 
"In the combination of rasas, the primary rasa which is the main angi-rasa remains independent by nourishing itself through the auxiliary bhavas, which may be of the same kind or different, but are not enemies."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)