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श्लोक 4.8.29  |
अथ वत्सले करुणस्य —
निरातपत्रः कान्तारे सन्ततं मुक्त-पादुकः ।
वत्सान् अवति वत्सो मे हन्त सन्तप्यते मनः ॥४.८.२९॥
अत्र मुख्ये गौणस्य । |
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| अनुवाद |
| वत्सल (प्राथमिक) को अंगी और करुणा-रस (द्वितीयक) को अंग मानकर एक उदाहरण: "मेरा प्रिय ग्वालबाल बिना छाते या जूतों के, कठिन रास्तों पर हर समय बछड़ों को चराता रहता है। ओह! यह सोचकर मेरा मन व्यथित हो जाता है।" |
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| An example, taking affection (primary) as the component and compassion (secondary) as the component: "My dear cowherd boy is always grazing the calves on difficult paths, without an umbrella or shoes. Oh! The thought of this pains me." |
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