श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.8.29 
अथ वत्सले करुणस्य —
निरातपत्रः कान्तारे सन्ततं मुक्त-पादुकः ।
वत्सान् अवति वत्सो मे हन्त सन्तप्यते मनः ॥४.८.२९॥
अत्र मुख्ये गौणस्य ।
 
 
अनुवाद
वत्सल (प्राथमिक) को अंगी और करुणा-रस (द्वितीयक) को अंग मानकर एक उदाहरण: "मेरा प्रिय ग्वालबाल बिना छाते या जूतों के, कठिन रास्तों पर हर समय बछड़ों को चराता रहता है। ओह! यह सोचकर मेरा मन व्यथित हो जाता है।"
 
An example, taking affection (primary) as the component and compassion (secondary) as the component: "My dear cowherd boy is always grazing the calves on difficult paths, without an umbrella or shoes. Oh! The thought of this pains me."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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