श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.8.28 
तत्रैव शुचिहास्ययोर्, यथा —
मिहिर-दुहितुर् उद्यद्-वञ्जुलं मञ्जु-तीरं
प्रविशति सुबलो’यं राधिका-वेष-गूढः ।
स-रभसम् अभिपश्यन् कृष्णम् अभ्युत्थितं यः
स्मित-विकशित-गण्डं स्वीयम् आस्यं वृणोति ॥४.८.२८॥
अत्र मुख्ये मुख्य-गौणयोः ।
 
 
अनुवाद
साख्य-रस (प्राथमिक) को अंगी और मधुर (प्राथमिक) तथा हास्य (द्वितीयक) को अंग के रूप में दर्शाने वाला एक उदाहरण: "सुबल राधा का वेश धारण किए, पुष्पित अशोक वृक्षों से युक्त यमुना के मनोरम तट पर आया। जब उसने कृष्ण को उसे छूने के लिए उठते देखा, तो उसने अपना चेहरा ढक लिया, उसके गालों पर मुस्कान फैल गई।"
 
An example showing Sākhya-rasa (primary) as the limb and madhura (primary) and hasya (secondary) as the limbs: "Subala, dressed as Radha, came to the picturesque banks of the Yamuna, dotted with flowering Ashoka trees. When he saw Krishna rising to touch her, he covered his face, a smile spreading across his cheeks."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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