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श्लोक 4.8.27  |
तत्रैव हासस्य, यथा —
दृशोस् तरलितैर् अलं व्रज निवृत्य मुग्धे व्रजं
वितर्कयसि मां यथा न हि तथास्मि किं भूरिणा ।
इतीरयति माधवे नव-विलासिनीं छद्मना
ददर्श सुबलो बलद्-विकच-दृष्टिर् अस्याननम् ॥४.८.२७॥
अत्र मुख्ये गौणस्य । |
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| अनुवाद |
| सख्य-रस (प्राथमिक) को अंगी और हास्य-रस (द्वितीयक) को अंग के रूप में दर्शाने वाला एक उदाहरण: "'हे मूर्ख लड़की! व्रज वापस जाओ। मेरी ओर आँखें मत झपकाओ। मैं वैसा व्यक्ति नहीं हूँ जैसा तुम सोचती हो! इतना क्यों बोलती हो?' जब कृष्ण एक नई प्रेमिका के साथ चिढ़ाने वाले अंदाज में बात कर रहे थे, तो सुबाला ने कृष्ण के चेहरे की ओर देखा, उनकी आँखें हँसी से फूट पड़ीं।" |
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| An example showing sakhya-rasa (primary) as the angi and hasya-rasa (secondary) as the anga: "'O foolish girl! Go back to Vraja. Don't wink at me. I am not the person you think I am! Why do you talk so much?' When Krishna was talking teasingly to a new lover, Subala looked at Krishna's face, her eyes bursting with laughter." |
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