श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.8.2 
शान्तस्य प्रीत-बीभत्स-धर्म-वीराः सुहृद्-वराः ।
अद्भुतश् चैष प्रीतादिषु चतुःष्व् अपि ॥४.८.२॥
 
 
अनुवाद
"शांत-रस के मित्र दास्य (प्रीति-रस), बीभत्स-रस, धर्म-वीर-रस और अदभुत-रस हैं। अदभुत-रस अन्य चार रसों का भी मित्र है: दास्य, सख्य, वत्सला और मधुर-रस।"
 
"The friends of Shanta-rasa are Dasya (Priti-rasa), Bibhatas-rasa, Dharma-veer-rasa and Adbhuta-rasa. Adbhuta-rasa is also the friend of the other four rasas: Dasya, Sakhya, Vatsala and Madhur-rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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