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श्लोक 4.8.18  |
भवेन् मुख्यो’थ वा गौणो रसो’ङ्गी किल यत्र यः ।
कर्तव्यं तत्र तस्याङ्गं सुहृद् एव रसो बुधैः ॥४.८.१८॥ |
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| अनुवाद |
| “जब कोई प्राथमिक या द्वितीयक रस सर्वाधिक प्रबल (अंगी) हो जाता है, तो सभी मित्र रस गौण (अंग) हो जाते हैं।” |
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| “When a primary or secondary rasa becomes the most dominant (angi), all the other rasas become secondary (anga).” |
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