श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.8.18 
भवेन् मुख्यो’थ वा गौणो रसो’ङ्गी किल यत्र यः ।
कर्तव्यं तत्र तस्याङ्गं सुहृद् एव रसो बुधैः ॥४.८.१८॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई प्राथमिक या द्वितीयक रस सर्वाधिक प्रबल (अंगी) हो जाता है, तो सभी मित्र रस गौण (अंग) हो जाते हैं।”
 
“When a primary or secondary rasa becomes the most dominant (angi), all the other rasas become secondary (anga).”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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