श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.8.12 
रौद्रस्य करुणः प्रोक्तो वीरश् चापि सुहृद्-वरः ।
प्रतिपक्षस् तु हास्ये’स्य शृङ्गारो भीषणो’पि च ॥४.८.१२॥
 
 
अनुवाद
"करुण और वीर-रस रौद्र-रस के लिए अनुकूल हैं। हास्य, मधुर और भयानक-रस शत्रु हैं।"
 
"Karun and Veera-rasas are favorable to Raudra-rasa. Hasya, Madhuri and Bhayanak-rasas are enemies."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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