श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस)  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.8.11 
करुणस्य सुहृद्-रौद्रो वत्सलश् च विलोक्यते ।
वैरी हास्यो’स्य सम्भोग-शृङ्गारश् चाद्भुतस् तथा ॥४.८.११॥
 
 
अनुवाद
"रौद्र-रस और वत्सल-रस करुणा-रस के लिए अनुकूल हैं। हास्य, मधुर-रस का संभोग (मिलन) भाग, और अदभुत-रस प्रतिकूल हैं।"
 
"Raudra-rasa and Vatsala-rasa are favorable to Karuna-rasa. Hasya, the intercourse (union) part of Madhura-rasa, and Adbhuta-rasa are unfavorable."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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