| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस » लहर 8: मैत्री-वैर-रस (संगत और असंगत रस) » श्लोक 10 |
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| | | | श्लोक 4.8.10  | वीरस्य त्व् अद्भुतो हास्यः प्रेयान् प्रीतिस् तथा सुहृत् ।
भयानको विपक्षो’स्य कस्यचिच् छान्त एव च ॥४.८.१०॥ | | | | | | अनुवाद | | "वीर-रस के लिए अद्भुत, हास्य, सख्य और दास्य-रस अनुकूल हैं। युद्ध-वीर-रस के लिए भयानक और शांत-रस प्रतिकूल हैं। दानवीर, दया-वीर और धर्म-वीर-रस के लिए, भयानक-रस प्रतिकूल है।" | | | | "For Veer-rasa, the wonderful, hasya, sakhya and dasya-rasas are favorable. For Yudh-veer-rasa, the terrible and the calm-rasas are unfavorable. For Danveer, Daya-veer and Dharma-veer-rasas, the terrible-rasa is unfavorable." | | ✨ ai-generated | | |
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