श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 7: वीभत्स-रस (भीषणता)  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.7.9 
अथ प्रायिकी —
अमेध्य-पूत्य्-अनुभवात् सर्वेषाम् एव सर्वतः ।
या प्रायो जायते सेयं जुगुप्सा प्रायिकी मता ॥४.७.९॥
 
 
अनुवाद
“सभी प्रकार के लोगों में और सभी प्रकार की परिस्थितियों में अशुद्ध या दुर्गंधयुक्त वस्तुओं से उत्पन्न होने वाली घृणा को प्रायिकि (सामान्य) घृणा कहते हैं।”
 
“The aversion to impure or foul-smelling objects arising in all kinds of people and under all kinds of circumstances is called general aversion.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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