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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस
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लहर 7: वीभत्स-रस (भीषणता)
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श्लोक 1
श्लोक
4.7.1
पुष्टिं निज-विभावाद्यैर् जुगुप्सा-रतिर् आगता ।
असौ भक्ति-रसो धीरैर् बीभत्साख्य इतीर्यते ॥४.७.१॥
अनुवाद
“जब जुगुप्सा-रति अपने विभावों और अन्य तत्वों [रस] द्वारा पोषित होती है, तो उसे बुद्धिमान लोग बीभत्स-भक्ति-रस कहते हैं।”
“When disgust-rati is nourished by its vibhavas and other elements [rasas], it is called by the wise as bibhatsa-bhakti-rasa.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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