श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.5.32 
अस्मिन् न तादृशो मन्यौ वर्तते रत्य्-अनुग्रहः ।
उदाहरण-मात्राय तथाप्य् एष निदर्शितः ॥४.५.३२॥
 
 
अनुवाद
"इस मन्यु (मित्रों के प्रति क्रोध) में रति (कृष्ण के प्रति प्रेम) स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं होती। अतः यहाँ मन्यु की चर्चा केवल उदाहरण देने के लिए की गई है।"
 
"In this Manu (anger towards friends) Rati (love for Krishna) is not clearly manifested. Therefore, Manu is discussed here only for illustrative purposes."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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