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श्लोक 4.5.32  |
अस्मिन् न तादृशो मन्यौ वर्तते रत्य्-अनुग्रहः ।
उदाहरण-मात्राय तथाप्य् एष निदर्शितः ॥४.५.३२॥ |
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| अनुवाद |
| "इस मन्यु (मित्रों के प्रति क्रोध) में रति (कृष्ण के प्रति प्रेम) स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं होती। अतः यहाँ मन्यु की चर्चा केवल उदाहरण देने के लिए की गई है।" |
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| "In this Manu (anger towards friends) Rati (love for Krishna) is not clearly manifested. Therefore, Manu is discussed here only for illustrative purposes." |
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