श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.5.24 
आवेगो जडता गर्वो निर्वेदो मोह-चापले ।
असूयौग्र्यं तथामर्ष-श्रमाद्या व्यभिचारिणः ॥४.५.२४॥
 
 
अनुवाद
"विशिष्ट व्यभिचारी-भाव हैं अवेगा, जदात, गर्व, निर्वेद, मोह, चापल्य, असूय, औघ्र्य, अमर्ष और श्रम।"
 
"The specific adulterous emotions are Avega, Jaadat, Garv, Nirveda, Moha, Chapalya, Asuya, Aughra, Amarsh and Shram."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)