श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.3.7 
यथा वा —
संरम्भ-प्रकटीकृत-प्रतिभटारम्भ-श्रियोः साद्भुतं
कालिन्दी-पुलिने वयस्य-निकरैर् आलोक्यमानस् तदा ।
अव्युत्थापित-सख्ययोर् अपि वराहङ्कार-विस्फूर्जितः
श्रीदाम्नश् च बकी-द्विषश् च समराटोपः पटीयान् अभूत् ॥४.३.७॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "श्रीदामा और कृष्ण, जो परम मित्र थे, यमुना के तट पर क्रोध से युद्ध करने का वैभव प्रदर्शित कर रहे थे। युद्ध में उनका प्रबल अभिमान और विजय की तीव्र इच्छा ने उनके सभी मित्रों को चकित कर दिया।"
 
Another example: "Sridama and Krishna, who were best friends, were displaying the glory of fighting angrily on the banks of the Yamuna. Their immense pride in battle and intense desire for victory astonished all their friends."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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