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श्लोक 4.3.53  |
वैष्णवत्वाद् रतिः कृष्णे क्रियते’नेन सर्वदा ।
कृतात्र द्विज-रूपे च भक्तिस् तेनास्य भक्तता ॥४.३.५३॥ |
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| अनुवाद |
| "चूँकि राजा भगवान के भक्त थे, इसलिए उनके मन में हमेशा कृष्ण के प्रति रति रहती थी। इस प्रकार ब्राह्मण का वेश धारण करके कृष्ण के प्रति भक्ति प्रदर्शित करना भी उनकी भक्ति की अभिव्यक्ति थी।" |
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| "Since the king was a devotee of the Lord, he always had love for Krishna in his heart. Thus, disguising himself as a Brahmin and demonstrating his devotion to Krishna was also an expression of his devotion." |
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