श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  4.3.47 
अथ दया-वीरः —
कृपार्द्र-हृदयत्वेन खण्डशो देहम् अर्पयन् ।
कृष्णायाच्छन्न-कृपाय दया-वीर इहोच्यते ॥४.३.४७॥
 
 
अनुवाद
"जो व्यक्ति दया से भरा हृदय रखते हुए, छद्म रूप में अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके कृष्ण को अर्पित करता है, उसे दया-वीर (दया दिखाने में दृढ़) कहा जाता है।"
 
"The person who, having a heart full of compassion, offers his body in pieces to Krishna in a disguised form, is called Daya-veera (steadfast in showing compassion)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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