श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  4.3.39 
यथा वा दश-रूपके—
लक्ष्मी-पयोधरोत्सङ्ग-कुङ्कुमारुणितो हरेः ।
बलिनैव स येनास्य भिक्षा-पात्रीकृतः करः ॥४.३.३९॥
 
 
अनुवाद
दशरूपक से: "बलि ने भगवान के हाथ में अन्न की गेंद अर्पित की, जो लक्ष्मी के वक्षस्थल से निकले कुंकुम से रंगी हुई थी।"
 
From the Dasarupaka: "Bali offered a ball of grain into the Lord's hand, which was colored with the kumkum that had come from the breast of Lakshmi."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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