श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.3.32 
यथा —
व्रजपतिर् इह सूनोर् जातकार्थं तथासौ
व्यतरद् अमल-चेताः सञ्चयं नैचिकीनाम् ।
पृथुर् अपि नृग-कीर्तिः साम्प्रतं संवृतासीद्
इति निजगदुर् उच्चैर् भूसुरा येन तृप्ताः ॥४.३.३२॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब शुद्ध हृदय वाले नंद ने कृष्ण के जन्मोत्सव के अवसर पर ब्राह्मणों को सभी उत्तम गायें दान में दीं, तो आस-पास के ब्राह्मण इतने संतुष्ट हुए कि उन्होंने जोर से कहा कि यह दान राजा नृग के दान से भी अधिक है।"
 
Example: "When the pure-hearted Nanda donated all the best cows to the brahmanas on the occasion of Krishna's birth anniversary, the brahmanas around were so satisfied that they loudly said that this donation was greater than the donation of King Nriga."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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