श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 2: अद्भुत-रस (विस्मय)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.2.5 
तत्र साक्षात्, यथा —
साक्षाद् ऐन्द्रियकं दृष्ट-श्रुत-सङ्कीर्तितादिकम् ॥४.२.५॥
 
 
अनुवाद
“जब अलौकिक क्रियाएं आंख, कान, मुंह या अन्य इंद्रियों द्वारा देखी जाती हैं, तो उसे प्रत्यक्ष कहा जाता है।”
 
“When supernatural actions are seen by the eyes, ears, mouth or other senses, it is called direct.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)