श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.1.29 
यथा —
शिम्बी-लम्बि-कुचासि दर्दुर-वधू-विस्पर्धि नासाकृतिस्
त्वं जीर्यद्-दुलि-दृष्टिर् ओष्ठ-तुलिताङ्गारा मृदङ्गोदरी ।
का त्वत्तः कुटिले परास्ति जटिला-पुत्रि क्षितौ सुन्दरी
पुण्येन व्रज-सुभ्रुवां तव धृतिं हर्तुं न वंशी क्षमा ॥४.१.२९॥
 
 
अनुवाद
"हे कुटिला (अभिमन्यु की बहन)! तुम्हारे स्तन सेम के समान लम्बे हैं! तुम्हारी नासिकाएँ मेढकी के समान हैं! तुम्हारी आँखें बूढ़े कछुओं के समान हैं। तुम्हारे होंठ अंगारों के समान हैं। तुम्हारा पेट ढोल के समान है। इस संसार में तुमसे अधिक सुन्दर कौन है? अपने पुण्यकर्मों के बल पर, व्रज की समस्त सुन्दरियों में केवल तुम ही बाँसुरी के आकर्षण को सहन कर सकी हो।"
 
"O Kutila (Abhimanyu's sister)! Your breasts are as long as beans! Your nostrils are like those of a frog! Your eyes are like those of an old tortoise. Your lips are like burning coals. Your belly is like a drum. Who in this world is more beautiful than you? By the power of your virtuous deeds, you alone among all the beauties of Vraja have been able to withstand the charm of the flute."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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