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श्लोक 4.1.28  |
यस्य हासः स चेत् क्वापि साक्षान् नैव निबध्यते ।
तथाप्य् एष विभावादि-सामर्थ्याद् उपलभ्यते ॥४.१.२८॥ |
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| अनुवाद |
| "यदि हास्य को भड़काने वाला व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से पहचाना न जा सके, तो उस व्यक्ति को अन्य प्रकरणों के साथ विभाव और अन्य तत्वों की समानता से समझा जा सकता है।" |
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| "If the person provoking the humour cannot be directly identified, that person can be understood by the similarity of the vibhava and other elements with other episodes." |
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