श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.1.27 
यथा —
वृद्धे त्वं वलिताननासि वलिभिः प्रेक्ष्य सुयोग्याम् अतस्
त्वाम् उद्वोढुम् असौ बली-मुख-वरो मां साधयत्य् उत्सुकः ।
आभिर् विप्लुत-धीर् वृणे न हि परं त्वत्तो बलि-ध्वंसनाद्
इत्य् उच्चैर् मुखरा-गिरा विजहसुः सोत्तालिका बालिकाः ॥४.१.२७॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "'बुढ़िया! तुम्हारी त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं। तुम बन्दर जैसी दिखती हो! वानरों के राजा (झुर्रीदार चेहरे वाले) ने मुझे तुम्हारा विवाह एक योग्य वर से कराने के लिए भेजा है।" यह सुनकर बुढ़िया बोली, 'इन झुर्रियों के कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गई है। इसलिए मैं तुम्हारे अतिरिक्त किसी और को वर के रूप में स्वीकार नहीं करूँगी, क्योंकि तुम राक्षसों का नाश करने वाले (और झुर्रियों को नष्ट करने वाले) हो।' मुकुंद के वचन सुनकर सभी बालक ताली बजाने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।"
 
Example: "'Old woman! Your skin is wrinkled. You look like a monkey! The king of the monkeys (with a wrinkled face) has sent me to arrange your marriage with a suitable groom.' Hearing this, the old woman said, 'These wrinkles have ruined my wisdom. Therefore, I will accept no one else as my husband except you, because you are the destroyer of demons (and destroyer of wrinkles).' Hearing Mukunda's words, all the children started clapping and laughing loudly."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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