श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.1.26 
अतिहसितम् —
सहस्र-तालं क्षिप्ताङ्गं तच् चातिहसितं विदुः ॥४.१.२६॥
 
 
अनुवाद
“हाथों से ताली बजाना और शरीर को झुकाना, दोनों के साथ हंसी को अतिहंसी (अत्यधिक हंसी) कहा जाता है।”
 
“Laughter accompanied by both clapping of hands and bowing of the body is called atihansi (excessive laughter).”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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