श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.1.23 
यथा —
लग्नस् ते नितरां दृशोर् अपि युगे किं धातु-रागो घनः
प्रातः पुत्र बलस्य वा किम् असितं वासस् त्वयाङ्गे धृतम् ।
इत्य् आकर्ण्य पुरो व्रजेश-गृहिणी-वाचं स्फुरन्-नासिका
दूती सङ्कुचद्-ईक्षणावहसितं जाता न रोद्धुं क्षमा ॥४.१.२३॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "हे पुत्र! सुबह-सुबह तुम्हारी दोनों आँखें कैसे गहरे रंगों से रंग गई हैं? तुम बलदेव का नीला वस्त्र क्यों धारण किए हुए हो?" यशोदा के ये वचन सुनकर वहाँ खड़े सेवक अपनी हँसी नहीं रोक पाए। उनकी आँखें सिकुड़ गईं और नाक फूल गई।"
 
Example: "My son, how come your eyes are so dark this morning? Why are you wearing Baladeva's blue robe?" Hearing Yashoda's words, the servants standing there couldn't help but laugh. Their eyes narrowed and their noses flared.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas