श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.1.19 
यथा —
मद्-वशेन पुरः-स्थितो हरिर् असौ पुत्रो’हम् एवास्मि ते
पश्येत्य् अच्युत-जल्प-विश्वसितया संरम्भ-रज्यद्-दृशा ।
माम् एति स्खलद्-अक्षरे जटिलया व्याक्रुश्य निष्कासिते
पुत्रे प्राङ्गतः सखी-कुलम् अभूद् दन्तांशु-धौताधरम् ॥४.१.१९॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "'हे माता! मैं आपका पुत्र अभिमन्यु हूँ। कृष्ण मेरे वस्त्र पहनकर यहाँ आ रहे हैं।' कृष्ण के वचनों पर विश्वास करके, क्रोध से लाल आँखें वाली जटिला चिल्लाने लगी और अपने असली पुत्र को आँगन से भगाने लगी, क्योंकि वह 'माँ! माँ!' कहने की कोशिश कर रहा था। राधा की सखियों के होंठ उनके दाँतों की चमक से चमकने लगे।"
 
Example: "'O Mother! I am your son Abhimanyu. Krishna is coming here wearing my clothes.' Believing Krishna's words, Jatila, her eyes red with anger, began to scream and chase her real son from the courtyard, as he tried to call out 'Mother! Mother!' The lips of Radha's friends began to shine with the gleam of their teeth."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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