श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद)  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.1.17 
यथा —
क्व यामि जरती खला दधि-हरं दिधीर्षन्त्य् असौ
प्रधावति जवेन मां सुबल मङ्क्षु रक्षां कुरु ।
इति स्खलद्-उदीरिते द्रवति कान्दिशीके हरौ
विकस्वर-मुखाम्बुजं कुलम् अभून् मुनीनां दिवि ॥४.१.१७॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "हे बलवान भाई! मैंने दही चुराया है, इसलिए यह दुष्ट बुढ़िया मुझे बाँधने के लिए मेरा पीछा कर रही है। मैं कहाँ जाऊँ? कृपया शीघ्र मेरी रक्षा करें!" रुँधे हुए स्वर में अपने बड़े भाई से ये शब्द कहकर कृष्ण भय से भाग गए। यह देखकर आकाश में ऋषियों के चेहरे खिल उठे।"
 
Example: "O strong brother! I have stolen yogurt, so this wicked old woman is chasing me to tie me up. Where should I go? Please save me quickly!" Saying these words to his elder brother in a choked voice, Krishna fled in fear. Seeing this, the faces of the sages in the sky lit up."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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