| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस » लहर 1: हास्य-रस (हंसी का परमानंद) » श्लोक 12-13 |
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| | | | श्लोक 4.1.12-13  | उद्दीपना हरेस् तादृग्-वाग्-वेष-चरितादयः ।
अनुभावास् तु नासौष्ठ-गण्ड-निष्पन्दनादयः ॥४.१.१२॥
हर्षालस्यावहित्थाद्या विज्ञेया व्यभिचारिणः ।
सा हास-रतिर् एवात्र स्थायि-भावतयोदिता ॥४.१.१३॥ | | | | | | अनुवाद | | "हास्य-रस के उद्दीपन कृष्ण के विनोदपूर्ण वचन, वेश-भूषा और आचरण हैं। अनुभव नाक, होंठ और गालों का फड़कना है। व्यभिचारी-भाव हर्ष (उल्लास), आलस्य (आलस्य) और अवहित (स्वयं को छिपाना) हैं। स्थाई-भाव हास्य-रति है।" | | | | "The stimuli of hasya-rasa are Krishna's humorous words, dress and behavior. Anubhava is the twitching of the nose, lips and cheeks. The vyabhichari-bhavas are harsha (joy), alasya (laziness) and avahit (hiding oneself). The sthayi-bhava is hasya-rati." | | ✨ ai-generated | | |
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