श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 5: माधुर्य-रस (प्रेम भाव)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.5.32 
यथा पद्यावल्याम् (३५०) —
हस्तोदरे विनिहितैक-कपोल-पालेर्
अश्रान्त-लोचन-जल-स्नपिताननायाः ।
प्रस्थान-मङ्गल-दिनावधि माधवस्य
निद्रा-लवो’पि कुत एव सरोरुहाक्ष्याः ॥३.५.३२॥
 
 
अनुवाद
पद्यावली [350] से एक उदाहरण: "जिस शुभ दिन कृष्ण मथुरा के लिए प्रस्थान कर रहे थे, कमल-मुख वाली राधा ने अपना बायाँ हाथ अपने बाएँ गाल पर रखकर, निरंतर आँसुओं से अपना मुख भिगोया। वह कैसे सो सकती थीं?"
 
An example from Padyavali [350]: "On the auspicious day when Krishna was leaving for Mathura, lotus-faced Radha, placing her left hand on her left cheek, continuously moistened her face with tears. How could she sleep?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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