श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 5: माधुर्य-रस (प्रेम भाव)  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.5.21 
राधा-माधवयोर् एव क्वापि भावैः कदाप्य् असौ ।
सजातीय-विजातीयैर् नैव विच्छिद्यते रतिः ॥३.५.२१॥
 
 
अनुवाद
“राधा और माधव का वह प्रेम कभी भी या किसी भी परिस्थिति में अन्य समान संबंधों या विभिन्न स्थाई भावों से आच्छादित नहीं होता।”
 
“That love of Radha and Madhava is never or under any circumstances overshadowed by other similar relationships or different permanent emotions.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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