श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  3.4.80 
एषा रस-त्रयी प्रोक्ता प्रीतादिः परमाद्भुता ।
तत्र केषुचिद् अप्य् अस्याः सङ्कुलत्वम् उदीर्यते ॥३.४.८०॥
 
 
अनुवाद
"आश्चर्य की बात यह है कि अभी वर्णित तीनों रस - प्रीति-रस, प्रेयो-रस और वत्सल-रस - कुछ भक्तों में एक साथ प्रकट होते हैं।"
 
"The surprising thing is that all the three rasas just described – priti-rasa, preyo-rasa and vatsala-rasa – appear simultaneously in some devotees."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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