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श्लोक 3.4.80  |
एषा रस-त्रयी प्रोक्ता प्रीतादिः परमाद्भुता ।
तत्र केषुचिद् अप्य् अस्याः सङ्कुलत्वम् उदीर्यते ॥३.४.८०॥ |
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| अनुवाद |
| "आश्चर्य की बात यह है कि अभी वर्णित तीनों रस - प्रीति-रस, प्रेयो-रस और वत्सल-रस - कुछ भक्तों में एक साथ प्रकट होते हैं।" |
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| "The surprising thing is that all the three rasas just described – priti-rasa, preyo-rasa and vatsala-rasa – appear simultaneously in some devotees." |
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