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श्लोक 77
श्लोक
3.4.77
स्वीकुर्वते रसम् इमं नाट्य-ज्ञा अपि केचन ॥३.४.७७॥
अनुवाद
“कुछ साहित्यिक विशेषज्ञ वत्सल-भक्ति-रस को रसों में से एक मानते हैं।”
“Some literary experts consider Vatsala-bhakti-rasa as one of the rasas.”
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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