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श्लोक 3.4.76  |
स्थितिर्, यथा विदग्ध-माधवे (१.१९) —
अहह कमल-गन्धेर् अत्र सौन्दर्य-वृन्दे
विनिहित-नयनेयं त्वन्-मुखेन्दोर् मुकुन्द ।
कुच-कलस-मुखाभ्याम् अम्बर-क्नोपम् अम्बा
तव मुहुर् अतिहर्षाद् वर्षति क्षीर-धाराम् ॥३.४.७६॥ |
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| अनुवाद |
| विदग्ध-माधव [1.19] से स्थिति (स्थायी संगति): "हे मुकुन्द! हमारी माता आपके कमल के समान सुगन्धित चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख पर दृष्टि गड़ाए हुए, अत्यन्त हर्षित होकर अपने स्तनों के दोनों कुण्डों के मुखों से निरन्तर दूध की धाराएँ बहा रही हैं। इस प्रकार उनके वस्त्र भीग जाते हैं।" |
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| Sthiti (permanent association) from Vidagdha-Madhava [1.19]: "O Mukunda! Our mother, gazing upon Your moon-like, beautiful face, fragrant like a lotus, is overjoyed and is constantly pouring streams of milk from the mouths of both the pools of Her breasts. Thus Her clothes become wet." |
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