श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.4.71 
उन्मादः —
क्व मे पुत्रो नीपाः कथयत कुरङ्गाः किम् इह वः
स बभ्रामाभ्यर्णे भणत तम् उदन्तं मधुकराः ।
इति भ्रामं भ्रामं भ्रम-भर-विदूना यदुपते
भवन्तं पृच्छन्ती दिशि दिशि यशोदा विचरति ॥३.४.७१॥
 
 
अनुवाद
उन्माद: "हे कदम्ब वृक्षों, मेरा पुत्र कहाँ है? हे मृगों, क्या मेरा पुत्र तुम्हारे पास विचरण कर रहा है? हे मधुमक्खियो! कृपया हमें उसके विषय में कुछ समाचार बताओ।" हे यदुदेव! इस प्रकार अत्यन्त भ्रमित मन से दुःखी यशोदा आपका समाचार पूछती हुई सभी दिशाओं में भटकने लगीं।
 
Madness: "O Kadamba trees, where is my son? O deer, is my son roaming among you? O bees, please tell us some news about him." O Lord of Yadus! Thus, deeply confused and distressed, Yashoda wandered in all directions, seeking news of you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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