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श्लोक 3.4.65  |
अत्र चिन्ता —
मन्द-स्पन्दम् अभूत् क्लमैर् अलघुभिः सन्दानितं मानसं
द्वन्द्वं लोचनयोश् चिराद् अविचल-व्याभुग्न-तारं स्थितम् ।
निश्वासैः स्रवद् एव पाकम् अयते स्तन्यं च तप्तैर् इदं
नूनं वल्लव-राज्ञि पुत्र-विरहोद्घूर्णाभिर् आक्रम्यसे ॥३.४.६५॥ |
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| अनुवाद |
| चिंता (सोचते हुए): "हे यशोदा! आपका मन भारी थकान से ग्रस्त होकर निष्क्रिय हो गया है। आपकी आँखों की पुतलियाँ स्थिर होकर टेढ़ी-मेढ़ी सी घूर रही हैं। आपके स्तनों से बहता दूध आपकी गर्म साँसों से पक गया है। निश्चय ही आप अपने पुत्र के वियोग में चंचलता से ग्रस्त हैं।" |
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| Chinta (thinking): "O Yashoda! Your mind is overcome with immense fatigue and has become inactive. The pupils of your eyes are fixed and staring askew. The milk flowing from your breasts has been cooked by your hot breath. Surely you are restless at the separation from your son." |
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