| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस » लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव) » श्लोक 64 |
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| | | | श्लोक 3.4.64  | बहूनाम् अपि सद्-भावे वियोगे’त्र तु केचन ।
चिन्ता विषाद-निर्वेद-जाड्य-दैन्यानि चापलम् ।
उन्माद-मोहाव् इत्य् आद्या अत्युद्रेकं व्रजन्त्य् अमी ॥३.४.६४॥ | | | | | | अनुवाद | | "यद्यपि वत्सल-रस में कई व्यभिचारी-भाव संभव हैं, वियोग के दौरान केवल चिंता, विषाद, निर्वेद, जादियाम, दैन्यम, चापाल्य, उन्माद और मोह ही प्रमुख हैं।" | | | | "Although many Vyatsala-Rasa (feelings of love) are possible, during Viyoga only Chinta, Vishada, Nirved, Jadiyam, Dainyam, Chapalya, Unmadya and Moh are prominent." | |
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