श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.4.49 
अथ व्यभिचारिणः —
तत्रापस्मार-सहिताः प्रीतोक्ताः व्यभिचारिणः ॥३.४.४९॥
 
 
अनुवाद
व्यभिचारी-भाव: "वात्सल्य-भक्ति-रस के व्यभिचारी-भाव, अपस्मार के अतिरिक्त, प्रीति-भक्ति-रस के समान हैं।"
 
Vyabhichari-bhāva: "The vyabhichari-bhāva of vātsalya-bhakti-rasa, except for epilepsy, is like that of preeti-bhakti-rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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