श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.4.48 
स्तम्भादयो, यथा —
कथम् अपि परिरब्धुं न क्षमा स्तब्ध-गात्री
कलयितुम् अपि नालं बाष्प-पुर-प्लुताक्षी ।
न च सुतम् उपदेष्टुं रुद्ध-कण्ठी समर्था
दधतम् अचलम् आसीद् व्याकुला गोकुलेशा ॥३.४.४८॥
Sतम्भ अन्द् ओथेर् सात्त्विक-भावस्:
 
 
अनुवाद
"गोकुल की व्याकुल रानी गोवर्धन उठाने वाले कृष्ण का आलिंगन नहीं कर सकी, क्योंकि उसके अंग स्तब्ध थे। न ही वह उनकी ओर देख सकी, क्योंकि उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। न ही वह उन्हें उपदेश दे सकी, क्योंकि उसका स्वर अवरुद्ध था।"
 
"The distraught queen of Gokula could not embrace Krishna, who was lifting Govardhan, because her limbs were numb. Nor could she look at him, because her eyes were filled with tears. Nor could she instruct him, because her voice was choked."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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