श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.4.47 
यथा वा ललित-माधवे (१.४६) —
निचुलित-गिरि-धातु-स्फीत-पत्रावलीकान्
अखिल-सुरभि-रेणून् क्षालयद्भिर् यशोदा ।
कुच-कलस-विमुक्तैः स्नेह-माध्वीक-मध्यैस्
तव नवम् अभिषेकं दुग्ध-पूरैः करोति ॥३.४.४७॥
 
 
अनुवाद
ललिता-माधव का एक और उदाहरण: "हे कृष्ण! यशोदा अपने स्तनों के कलशों से प्रवाहित स्नेहरूपी मधुमिश्रित दूध की परम पवित्र धाराओं द्वारा, आपके शरीर पर पर्वतों में पाए जाने वाले खनिजों से बने चित्रों को ढकने वाली गायों के खुरों से उड़ी धूल को धो रही हैं। इस प्रकार वे आपको प्रथम स्नान कराती हैं।"
 
Another example from Lalita-Madhava: "O Krishna! Yashoda is washing away the dust from the cows' hooves that covers the images on Your body made of minerals found in the mountains, with the most sacred streams of milk mixed with honey, the form of affection, flowing from the pitchers of her breasts. Thus she gives You the first bath."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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