श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.4.39 
अथ शैशव-चापलम् —
पारीर् भिनत्ति विकिरत्य् अजिरे दधीनि
सन्तानिकां हरति कृन्तति मन्थ-दण्डम् ।
वह्नौ क्षिपत्य् अविरतं नव-नीतम् इत्थं
मातुः प्रमोद-भरम् एव हरिस् तनोति ॥३.४.३९॥
 
 
अनुवाद
उनके कैसर युग की धृष्टता: "कृष्ण ने दूध के बर्तनों को तोड़कर, दही को बिखेरकर, दूध से मलाई चुराकर, मथनी को तोड़कर और लगातार मक्खन को आग पर फेंककर माता यशोदा को आनंद दिया।"
 
His Caesar-era audacity: "Krishna gave joy to Mother Yashoda by breaking the milk pots, spilling the curds, stealing the cream from the milk, breaking the churner and continuously throwing butter on the fire."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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