श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.4.37 
नव्येन यौवनेनापि दीव्यन् गोष्ठेन्द्र-नन्दनः ।
भाति केवल-वात्सल्य-भाजां पौगण्ड-भाग् इव ॥३.४.३७॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि कृष्ण नव-यौवन (उत्तर-कैशोर) युग में सुन्दर हैं, फिर भी शुद्ध वात्सल्य रस में स्थित लोगों के लिए वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे अभी भी पौगण्ड युग में हों।
 
Although Krishna is beautiful in his youthful (late adolescence), yet to those who are in the pure state of affection, he appears as if he is still in his youth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)