श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 4: वात्सल्य-रस (मातृ पितृत्व भाव)  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.4.22 
यथा —
मुख-पुट-कृत-पादाम्भोरुहाङ्गुष्ठ-मूर्ध-
प्रचल-चरण-युग्मं पुत्रम् उत्तान-सुप्तम् ।
क्षणम् इह विरुदन्तं स्मेर-वक्त्रं क्षणं सा
तिलम् अपि विरतासीन् नेक्षितुं गोष्ठ-राज्ञी ॥३.४.२२॥
 
 
अनुवाद
एक उदाहरण: "यशोदा अपने पुत्र को अपने पैर का अंगूठा चूसते, अपने दोनों पैर हवा में उछालते, पीठ के बल लेटे, कभी रोते और कभी हंसते हुए देखती रहीं।"
 
An example: "Yashoda watched her son sucking his toe, kicking his legs in the air, lying on his back, sometimes crying and sometimes laughing."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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