श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.2.96 
तत्र उत्कण्ठितम् —
अदृष्ट-पूर्वस्य हरेर् दिदृक्षोत्कण्ठितं मतम् ॥३.२.९६॥
 
 
अनुवाद
“जब भक्त ने भगवान को बिल्कुल भी नहीं देखा हो, तब भी उन्हें देखने की इच्छा उत्कण्ठितम् कहलाती है।”
 
“Even when the devotee has not seen the Lord at all, the desire to see Him is called Utkanthitam.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)