श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  3.2.66 
अथ सात्त्विकाः —
स्तम्भाद्याः सात्त्विकाः सर्वे प्रीतादि-त्रितये मताः ॥३.२.६६॥
 
 
अनुवाद
सात्विक-भाव: "ऐसा कहा जाता है कि स्तंभ (पक्षाघात) से शुरू होने वाले सभी सात्विक-भाव प्रीति- (दास्य), प्रेयो- (साख्य) और मधुर-रस में प्रकट होते हैं।"
 
Satvik-bhāva: "It is said that all the Satvik-bhāva starting from the stambhara (parabhava) manifest in priti- (dasya), preyo- (sakhya) and madhura-rasa."
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